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Ghazals from Dr. Ram kumar singh

सांत्वना के सौ बहाने हो गये।
दरअसल अब वो पुराने हो गये।
बैठते थे मंच के जो मध्य में
पार्श्व में जाकर फसाने हो गये।
संस्था ने एक कम्प्यूटर मँगाया
और दस साथी रवाने हो गये।
चोरियाँ बढ़ने लगी हैं आजकल
अब नगर में पुलिस थाने हो गये।
कल हमारे बीच से उठकर, सियासी-
ओढ़कर चोला सयाने हो गये।
बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये
आप-औ’ हम शामियाने हो गये।
ख्याति पा अब आप हैं पहुँचे हुये
किन्नरों से जाने-माने हो गये।
आप थे जो गुड़ तो घर-घर में रहे
आप अब काजू-मखाने हो गये।

-डॉ. रामकुमार सिंह

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